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| तुलसीदास जी श्रीरामचरितमानस की रचना से पूर्व ध्यानस्थ भाव में |
तुलसीदास की विनम्रता और आत्मविश्वास: श्रीरामचरितमानस की रचना से पहले का भाव
श्रीरामचरितमानस — रचना की भूमिका
विषयसूची
- तुलसीदास की विनम्रता
- छोटा भाग्य बड़ी अभिलाषा
- साधु संग की महिमा
- तुलसीदास आत्मबोध
- रामकथा और श्रद्धा (सीखें)
- निष्कर्ष
- प्रश्न उत्तर
भूमिका: आत्मस्वीकृति के साथ आत्मविश्वास
- श्रीरामचरितमानस जैसे महान और दिव्य ग्रंथ की रचना करना कोई साधारण कार्य नहीं था।
- लेकिन गोस्वामी तुलसीदास जी ने जब यह कार्य आरंभ किया, तब उन्होंने खुद को सर्वथा अक्षम और असमर्थ माना।
“मोरें मति मंद अति, गुण नाना।करौं कौन बिधि रघुनाथ गुन गाना॥”श्रीरामचरितमानस, मंगलाचरण, बालकाण्ड।भावार्थ:मेरी बुद्धि मंद है और मुझमें कोई विशेष गुण भी नहीं, फिर भी मैं रघुनाथ (श्रीराम) के गुणों का गान कैसे कर सकूँ?
छोटा भाग्य, बड़ी अभिलाषा
“भाग्य हीन मम काव्य न चाहहिं सुनि कोइ।तोहिं प्रनामि पुनि पुनि कहउँ कर जोइ॥”श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, कवित्त।भावार्थ:हे प्रभु! मेरे काव्य में कोई विशेषता नहीं, शायद कोई इसे सुनना भी न चाहे। फिर भी मैं बारंबार आपको प्रणाम करके अपनी वाणी अर्पित करता हूँ।
साधु संग और श्रीराम का प्रभाव ही पर्याप्त है
तुलसीदास जी को इस बात का पूर्ण विश्वास था कि यदि उनकी कविता में श्रीराम का प्रताप और साधु संग की कृपा जुड़ जाए, तो फिर वह साधारण भी असाधारण बन सकती है।
“राम बिरुद बिचित्र रघुबर चरित जानकी प्यारो।संगति साधु की अधिक प्रभाउ, नहिं तौ तुलसी काव्य कछु भारो॥”श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, कवित्त।भावार्थ:मेरे काव्य में यदि श्रीराम के गुण, जानकी जी की लीला और साधु संग का प्रभाव जुड़ जाए, तो यह महान बन जाएगा, नहीं तो तुलसी का काव्य कोई विशेष नहीं।
विनम्रता और श्रद्धा: तुलसीदास का आदर्श स्वरूप
- तुलसीदास जी की यही विनम्रता उन्हें महान बनाती है।
- वह रचना का श्रेय स्वयं को नहीं, भगवान की कृपा और संत संग को देते हैं।
- यह भाव उनके समर्पण, श्रद्धा और आत्मज्ञानी स्वभाव को दर्शाता है।
सीखें तुलसीदास जी से
-
कर्म करें, अहंकार नहीं रखें।
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श्रद्धा रखें, परिणाम प्रभु पर छोड़ें।
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विनम्रता ही सबसे बड़ा गुण है।
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संतों का संग और प्रभु का स्मरण साधारण को भी विशेष बना देता है।
निष्कर्ष
प्रश्न–उत्तर
प्रश्न : तुलसीदास जी ने अपनी बुद्धि को सीमित क्यों कहा?
उत्तर: क्योंकि वे श्रीराम के चरित्र को असीम मानते थे और स्वयं को उस विषय का अयोग्य पात्र मानते हुए भी पूरी श्रद्धा से कथा कहते हैं।
प्रश्न : तुलसीदास जी को क्या विश्वास था?
उत्तर: कि यदि श्रीराम का प्रताप और साधु संग का प्रभाव उनकी कविता में जुड़ जाए तो वह सफल हो जाएगी।
प्रश्न : तुलसीदास ने अपने काव्य को क्या माना?
उत्तर: उन्होंने अपने काव्य को साधारण माना और उसकी गरिमा श्रीराम और संतों की कृपा से जोड़ी।
📌 संदर्भ वीडियो लिंक🎥 इस कथा को वीडियो में भी सुनें और भाव विभोर हों।🙏 जय श्रीराम! 🌸
